शब्द — जो युद्ध से भी अधिक घातक होते हैं
महाभारत और वैदिक दर्शन से प्रेरित एक दार्शनिक पुनर्रचना |
संपादकीय टिप्पणी (महत्वपूर्ण):
यह लेख महाभारत के स्त्री पर्व, शांति पर्व, भगवद्गीता तथा वैदिक कर्म-दर्शन पर आधारित एक दार्शनिक एवं व्याख्यात्मक पुनर्रचना है। इसमें प्रस्तुत संवाद शाब्दिक उद्धरण नहीं, बल्कि शास्त्रीय भावार्थ और वैदिक दृष्टि से प्रेरित हैं।
अठारह दिनों का महायुद्ध
केवल कुरुक्षेत्र की भूमि पर नहीं लड़ा गया था।
वह युद्ध
मानव चेतना, स्मृति और आत्मा के भीतर भी
अनवरत घटित हुआ।
द्रौपदी—
आयु से युवा,
पर अनुभूति में अस्सी वर्षों की थकान लिए।
कुरुक्षेत्र के बाद
हस्तिनापुर में
पुरुष कम थे,
विधवाएँ असंख्य।
बच्चे पिता के नाम पूछते थे,
और उत्तर में केवल
मौन मिलता था।
राजमहल के एक कक्ष में
महारानी द्रौपदी
निश्चेष्ट बैठी थी।
दृष्टि शून्य में थी—
पर वह शून्य
उसके भीतर से उपजा था।
तभी
वह प्रवेश करते हैं—
जिन्हें संसार सखा कहता है
और काल साक्षी।
श्रीकृष्ण।
उन्हें देखते ही
द्रौपदी का धैर्य टूट जाता है।
वह दौड़कर उनसे लिपट जाती है।
कृष्ण
कुछ नहीं कहते।
वे जानते हैं—
जहाँ शब्द
पीड़ा को छोटा कर देते हैं,
वहाँ मौन
उसे सहने योग्य बनाता है।
वे उसके केशों पर
हाथ फेरते रहते हैं।
उसे रो लेने देते हैं।
क्योंकि रोना भी
कभी-कभी
कर्मों के बोझ से
मुक्ति का पहला चरण होता है।
कुछ क्षणों बाद
वे उसे पास बैठा देते हैं।
द्रौपदी (कातर स्वर में):
“सखा…
यह सब कैसे हो गया?
मैंने तो ऐसा अंत
कभी नहीं चाहा था।”
कृष्ण (अत्यंत शांत स्वर में):
“पांचाली,
नियति हमारी इच्छाओं के अनुसार
नहीं चलती।
वह केवल
हमारे कर्मों को
परिणाम में बदलती है।”
कर्मण्येवाधिकारस्ते
मा फलेषु कदाचन।
(भगवद्गीता 2.47)
तुमने न्याय चाहा था।
तुम्हें न्याय मिला।
पर न्याय का मूल्य
अक्सर
हमारी कल्पना से
कहीं अधिक होता है।”
द्रौपदी (पीड़ा से):
“क्या इस विनाश में
मेरा भी अंश है, कृष्ण?”
कृष्ण (गंभीर दृष्टि से):
“स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो, पांचाली।
यह युद्ध अनेक अहंकारों,
अनेक अपूर्ण निर्णयों
और अनेक असंयमित शब्दों
का संयुक्त परिणाम है।”
“किन्तु यह भी सत्य है—
यदि मनुष्य
अपने कर्मों के साथ
दूरदर्शिता जोड़ ले,
तो कष्ट की तीव्रता
कम हो सकती है।”
अवश्यमेव भोक्तव्यं
कृतं कर्म शुभाशुभम्।
(महाभारत — कर्म सिद्धांत)
द्रौपदी (कंपित स्वर में):
“मैं क्या कर सकती थी, सखा?”
कृष्ण (धीमे किंतु स्पष्ट स्वर में):
“बहुत कुछ।
जब स्वयंवर में
कर्ण को अवसर न मिल सका—
चाहे वह सामाजिक मर्यादा हो
या व्यक्तिगत निर्णय—
वहीं इतिहास ने
एक कठोर मोड़ लिया।
जब परिस्थितियों को
प्रश्न के स्थान पर
मौन स्वीकार मिला—
तब धर्म
आदेश बन गया,
संवाद नहीं।
और फिर—
क्रोध में कहा गया
एक वाक्य—
जो केवल शब्द नहीं था,
एक शस्त्र था।”
कृष्ण क्षण भर रुकते हैं।
फिर कहते हैं—
“द्रौपदी,
शब्द भी कर्म होते हैं।”
वाक्सायं संयतो भवेत्।
(मनुस्मृति 2.161)
“शब्द
कभी केवल बोलने वाले के
नहीं रहते।
वे वातावरण,
मानसिकता
और भविष्य
तीनों को गढ़ते हैं।
इस संसार में
केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है
जिसका विष
उसके दाँतों में नहीं,
उसकी वाणी में होता है।
एक वाक्य
युद्ध को जन्म दे सकता है।
एक अपमान
पीढ़ियों का अंत लिख सकता है।”
वे शांत स्वर में जोड़ते हैं—
सत्यं ब्रूयात्
प्रियं ब्रूयात्
न ब्रूयात् सत्यमप्रियं।
(मनुस्मृति 4.138)
“सत्य बोलो,
पर ऐसा सत्य नहीं
जो विनाश बो दे।
क्योंकि
हर सत्य
कहने योग्य नहीं होता—
और हर मौन
कायरता नहीं होता।”
द्रौपदी
अब निःशब्द है।
उसकी आँखों में
क्रोध नहीं,
समझ है।
और वैदिक दृष्टि में
समझ ही मनुष्य की
सबसे बड़ी विजय है।
📚 संदर्भ (References)
-
महाभारत — स्त्री पर्व, शांति पर्व
-
भगवद्गीता — अध्याय 2
-
मनुस्मृति — अध्याय 2, 4
-
वेदान्त दर्शन — कर्म-फल सिद्धांत
-
व्यास परंपरा — दार्शनिक व्याख्याएँ
अंतिम टिप्पणी
यह कथा
द्रौपदी की नहीं,
हम सबकी है।
क्योंकि हर युग में
कुरुक्षेत्र बदलता है,
पर शब्दों की शक्ति
अपरिवर्तित रहती है।
